Tuesday, August 22, 2017

Geet: Suraj Sunami (गीत: सूरज सुनामी, तरन्नुम)

Sunday, June 21, 2015

बाल कहानी

एकता में बड़ी शक्ति है:

एक गाँव में एक किसान रहता था। उसके चार लडके थे। किसान ने खूब अच्छी तरह से अपने चारो बेटों को पाला पोसा और हरेक बेटे का बहुत सुन्दर लड़की से विवाह किया। जब तक किसान जवान था उसने सभी को एक जुट रखा और किसी भी चीज़ की कमी नहीं आने दी घर में। सारे गांव में उसके परिवार की एकता की मिसाल दी जाती थी। जब किसान बूढ़ा होने लगा तो उसकी पकड़ परिवार पर कम होने लगी। अब चारों बेटों ने ज़मीन को बराबर बाँट लिया और खेती करने लगे। उन्होंने घर के भी चार हिस्से कर लिए और एक छोटी सी कोठरी बूढ़े किसान को दे दी। जिसमें बारी बारी से सभी उसको रोटी पानी दे देते थे। अब चारों परिवारों में छोटी छोटी बातों पर लड़ाई झगड़े होने लगे। बात इतनी बढ़ गई की कोई किसी से बोलता भी नहीं था। गांव के दबंग परिवार अगर किसी एक भाई पर हावी होकर उसे दबाते झगड़ा करते तो दूसरा कोई भाई उसका साथ नहीं देता। अब तो चारो भाइयों की फसल को भी नुकसान पहुचाने लगे गांव के दबंग लोग। चारों अपने अपने खेतों में खूब मेह्नत से काम करते मगर घर तक आते आते फसल आधी ही रह जाती। इससे बूढ़े किसान को भी रोटी देने में चारों आनाकानी करने लगे।
बूढ़े किसान ने एक दिन चारों को एक साथ अपने पास बुलाया और चारों को एक एक लकड़ी दी और कहा तोड़ो। चारों ने झट से अपनी अपनी लकडी तोड़ दीं। अब किसान ने चार लकड़ियों को एक साथ बाँधकर हरेक बेटे को बारी बारी से तोड़ने को कहा। चारों ने अलग अलग खूब ज़ोर लगाया मगर कोई भी चारों लकड़ियों को एक साथ तोड़ नहीं पाया। अब किसान ने कहा की बच्चों एकता में बहुत शक्ति होती है। जैसे तुम एक साथ बंधी इन चारों लकड़ियों को नहीं तोड़ पाये वैसे ही तुम चारों एक जुट रहो और सुख-दुःख में एक दूसरे का सहारा बनो, तो गांव में कोई भी तुम्हारी फसल को पशुओं और बाल बच्चों को नुकसान पहुँचाने की हिम्मत नहीं कर पायेगा। तभी से चारों भाईयों ने एक साथ रहने का प्रण किया। अगर कोई भाई किसी परेशानी में पड़ता तो बाकि तीनो उसकी सहायता में जुट जाते। धीरे धीरे उनकी एकता देखकर सभी लोग बेवजह उनसे टकराने से बचने लगे। अब सभी भाई खुशहाल ज़िन्दगी जीने लगे। सच ही कहा है की एकता में बड़ी शक्ति है।
(अशोक कश्यप)  
बाल कविता

मोबाईल फोन:

मैं हूँ इक मोबाईल फोन
देखा न जिसने ऐसा कौन
साथ हमेशा मैं रहता हूँ
सुख-दुःख संग संग सहता हूँ
चिट्ठी देता फ़ोटो लेता
भूले हों तो याद कर देता।

मैंने बिजनेस खूब बढ़ाया
धन और समय सभी का बचाया
उलझ गए तो हिसाब लगाया
और फिर तुमने खूब कमाया
घर ऑफिस और ऑफिस घर अब
पल में तुमरी मुट्ठी में सब।

मेरे आने से सिकुड़ गई दुनिया
पास सभी के मुन्ना हो या मुनिया।
(अशोक कश्यप)
बाल गीत

देश वो चमन:

देश वो चमन हमारा देश वो चमन
महके जिससे जग ये सारा देश वो चमन

हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाइयों से फूल
गाँधी, नेहरू, जैसी महक भगतसिंह से शूल
फूल भी और शूल भी हम चाहते अमन

देश वो चमन हमारा देश वो चमन
महके जिससे जग ये सारा देश वो चमन

साईना, सुनीता, कल्पना सी कली हैं
लता जैसी मीठी मिश्री की डली हैं
ये कली-डली बनी रहें दिल से है नमन

देश वो चमन हमारा देश वो चमन
महके जिससे जग ये सारा देश वो चमन

अटल और मनमोहन से बागवान हैं
प्रणव और कलाम जैसे प्रतिभावान हैं
सचिन और बच्चन में विश्व है मगन

देश वो चमन हमारा देश वो चमन
महके जिससे जग ये सारा देश वो चमन
(अशोक कश्यप)


Tuesday, May 26, 2015

पेड़ अपने नीचे किसी भी अन्य पौधे को पनपने नहीं देता। वह तो अपने आस पास भी अन्य पौधे को बर्दास्त नहीं करता, यहाँ तक की वह अपने फूल, पत्तियों और बीजों को भी अपने भोजन में शामिल कर लेता है।
इसके विपरीत झाड़ियाँ अपने नज़दीक, अपनी और अन्य प्रजातियों के पेड़ - पौधों को फलने - फूलने का पूरा मौका देती हैं। कहा जाता है कि संजीवनी भी एक झाड़ी ही थी। मनुष्यों में भी कुछ पेड़ और झाड़ियाँ हैं।
(कवि अशोक कश्यप)

Wednesday, March 11, 2015

गीत:

मधुर-मधुर मीठी सी चाशनी सी ज़िंदगी
मदिर-मदिर धीमी सी रोशनी सी ज़िंदगी 

गाँव के अँधेरे में, जुगनुओं के फेरे में    2
झिलमिलाती खिलखिलाती जागती सी ज़िंदगी 

मधुर-मधुर मीठी सी चाशनी सी ज़िंदगी
मदिर-मदिर धीमी सी रोशनी सी ज़िंदगी,
(कवि अशोक कश्यप)